Friday, 21 October 2011

श्रेष्ठ कविता अपने रंजक धर्म से पाठक के हृदय में प्रवेश करती है और उसे अपना दोस्त बना लेती है।

पिछली पोस्ट पढ़कर युवा कवि -आलोचक अरविद अवस्थी का कहना है कि डाॅ जीवन सिंह जिस साफगोई से अपनी बात कहते हैं ऐसा वही व्यक्ति कर सकता है जो सभी तरह के पाखंडों से मुक्त हो  बात बिल्कुल सही है । इस साक्षात्कार में अनेक स्थल ऐसे हैं जहाँ उनकी बेवाकी और साहस के बार-बार दर्शन होते हैं । प्रस्तुत है साक्षात्कार की तीसरी कड़ी -


कपिलेश भोज-आपने अपनी पुस्तक ’कविता की लोक प्रकृति ’ में लिखा है कि ’’ यह जरूरी है कि कविता में हमारा यथार्थ कविता बनता है या नहीं , कहीं कच्चा यथार्थ ही तो षेष नही रह जाता ’’ - प्रष्न यह है कि यथार्थ कविता कैसे बनता है ? इसकी समझ रचनाकारों के लिए बेहद जरूरी है ,नए रचनाकारों के लिए तो और भी ज्यादा । अतः इसे भी सोदाहरण स्पष्ट कर दें कि जीवन के यथार्थ के कविता बनने की प्रक्रिया क्या होती है तो यह अत्यंत उपयोगी होगा।
डाॅ0 जीवन सिंह- सामान्य तौर पर हम यथार्थ उसे कहते हैं जो हमारी आँखों के सामने प्रत्यक्ष नजर आता है और  जिसका बोध हम अपनी ज्ञानेंद्रियों से करते हैं । इसमें सबसे ज्यादा काम हमारे आँख और कान करते हैं । यथार्थ लेकिन इतना ही नहीं होता । कई बार आँखों से देखा और कानों से सुना भी यथार्थ नहीं होता। हम एक इतिहास से गुजर कर आज इस 2011 ई0 तक पहँुचे हैं। यह हमारा बहुत सीमित पंचांग है। इसमें व्यक्ति ,समाज और सत्ताओं ने अनेक तरह के ऐसे विभ्रमों ( इल्यूजन) का सृजन भी किया है ,जो ऊपर से देखने पर हमको यथार्थ लगते हैं। इस वजह से यथार्थ को जानने के लिए जरूरी होता है कि एक कवि कुछ बनी-बनाई और गढ़ी हुई संस्कारबद्ध बातों को ही यथार्थ नहीं माने । वह दर्षन और इतिहास के मार्फत चीजों की गहराई में उतरने का प्रयास करे , जिससे ’यथार्थ’ का असली रूप उसे हासिल कर सके। मुक्तिबोध की कविता को देख लीजिए कितना बड़ा प्रयत्न वे यथार्थ तक पहुँचने के लिए करते हैं। सामान्यतया देखने में आता है कि कविगण सुनी सुनाई और चालू मुहावरे वाली बातों को ही कुछ हेरफेर करके ’ यथार्थ ’ की तरह पेष करते रहते हैं। मेहनत करने वालों की बेहद कमी आज सभी जगह है। लोग पके-पकाए को प्रीति भोज की तरह खाने की फिराक में रहते हैं। कुछ लोग इसे यष प्राप्ति और कुछ आय का एक स्रोत मानकर इस दिषा में कदम रखे हुए होते हैं। लेकिन इस मैदान में टिक वहीं पाते हैं , जो एक सच्चे योद्धा की तरह मैदान में उतरते हैं। जैसे जीवन ,संग्राम होता है , वैसे सृजनात्मकता भी एक भिन्न तरह का संग्राम ही है। यहाँ भावों और विचारों का युद्ध लड़ना पड़ता है। जो विचारों का युद्ध करने से कतराता है उसे यहाँ कदम नहीं रखना चाहिए । दूसरे ,जीवन की व्यापकता में हमारी जितनी गहरी पैठ होगी , हम उतने ही यथार्थ के नजदीक पहँुच सकेंगे। कबीर अपने जीवनानुभवों के बल पर ही यथार्थ तक पहुँच पाए थे। तुलसी ने भी अपने व्यापक जीवनानुभवों से लोकहृदय को जाना था , लेकिन जब वे वैचारिकता के लिए षास्त्रों के पास गए तो वे उनके विभ्रमों में उलझे बिना नहीं रह पाए । उनकी सारी वैचारिक उलझनें षास्त्र-निर्भरता के कारण हैं। मीरा भी अपने जीवनानुभवों के आधार पर वह विद्रोह कर सकी थी , जो सामान्यतया संभव नहीं हो पाता । इसी से यथार्थ का एक अछूता कोना उद्घाटित हुआ। रीतिकाल के कवि बहुत ऊपरी और सतही यथार्थ में उलझकर रह गए।सच तो यह है कि उनकी काव्य-सर्जना का कोई बड़ा प्रयोजना नहीं था। इसलिए वे यष और अर्थ से आगे न जा सके । कला-प्रतिभा उनके पास अवष्य थी , जिससे श्रेष्ठ कविता तो वे कर सके , बड़ी कविता नहीं कर पाए । बड़ी कविता करने के लिए यथार्थ को समझने के लिए अपने समय की गहराइयों में उतरकर ढूँढना पड़ता है और जीवन की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए वहाँ तक पहुँचना पड़ता है ,जहाँ जीवन के सरोकारों में व्यक्ति के पास श्रम की पूँजी के अलावा और कुछ नहीं होता । हमारे आज के ज्यादातर मध्यवर्गीय कवि इस काम को नहीं कर पाते । वे अपने वर्गीय जीवन की सीमा से बाहर नहीं जा पाते। इससे उनकी सर्जना में प्राणतत्व नहीं आ पात । चूँकि आज का जीवन वर्गीय सीमाओं में विभक्त जीवन है इसलिए तय करना पड़ता है कि हम किसके साथ हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम अपने समय की चकाचैंध में फँसकर षोषक-उत्पीड़क उच्चवर्ग की पक्षधरता में आ गए हैं? मध्यवर्ग के ढुलमुलपन जिसे मुक्तिबोध ने ’बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास ’ कहा है , में भी हम फँसे रह सकते हैं। आज के ज्यादातर कवि इस गिरफ्त में हैं। एक जमाने के मध्यवर्ग की हैसियत भी बदलती है। वह मध्यवर्ग से छलाँग लागाकर उच्चवर्ग में चला जाता है और अपने साथियों-सहयोगियों के साथ छल करता है। इसके लिए जरूरी है कि हम अपने समय के उत्पादन संबंधों को जानें। उत्पादन-संबंधों और स्वामित्व के सवाल को ,जो नहीं समझ पाते ,वे यथार्थ की जटिलताओं तक भी नहीं पहँुच पाते । इसी वजह से ऐसे कवियों का यथार्थ ,परिपक्वता की स्थिति तक नहीं पहुँच पाता । मुक्तिबोध ने कविता के तीन क्षणों की बात कही है । इनमें पहला क्षण ’तत्व चिंता’ का होता है। तत्व-संधान की प्रक्रिया के लिए अनेक तरह की ज्ञानात्मक प्रक्रियाओं से होकर कवि को गुजरने का प्रयास करना चाहिए। यह एक दिन का काम नहीं है सतत् अभ्यास ,अनुभव और अध्ययन का कम भी है। जब एक बार गाड़ी पटरी पर चलने लगती है ,तो फिर रास्ता आसान हो जाता है।
  यथार्थ को समझने की दृष्टि से मैं यहाँ आज के महत्वपूर्ण कवि विजेंद्र की एक कविता का पूर्वाद्ध उद्धृत कर रहा हँू। कविता इस प्रकार है- षीर्षक है ’ रेलवे पोस्टर ’ - तुमने भारत को पोस्टरों में देखा है/एक साँवली औरत / घने जूड़े में / बड़ा-सा फूल / खोंस रही है/ एक देसी कमल पोखर से बच्चे की तरह / उझक रहा है/ एक आदमी गाँव को बोझ लिए मचकता /जा रहा है / वहाँ कभी /तुमने भारत देखा है /उसकी खाकी मिट्टी /पथरीले उठान/ रेत के लहरियोंदार ढूह / चट्टानी ढलान / वहाँ तुम्हें जिस्म पर पड़ी सिकुड़नें दिखाई नहीं देगी / पीछे दूर तक नीला आसमान / छिदरे छिदरे बबूलों के वन दिखाई नहीं देंगे । यह आज की एक महत्वपूर्ण कविता है ,यद्यपि यह आज से तीस-पैंतीस वर्ष पहले की लिखी हुई कविता है । विजेंद्र के 1980 ई0 में प्रकाषित ’ ये आकृतियाँ तुम्हारी ’ संग्रह में है। यहाँ यथार्थ को समझने की प्रक्रिया से अवगत कराया गया है। सत्ता के भी अपने कलाकार होते हैं, जो अयथार्थ को यथार्थ और यथार्थ को अयथार्थ में बदलने का काम करते हैं। हमारे यहाँ पोस्टरों और विज्ञापनों में औरत के षरीर का उपयोग सबसे ज्यादा किया जाता है। उसमें भी उसकी असलियत नहीं दिखलाई जाती । यथार्थ को कला के आवरण से ढका जाता है ,जिससे देष-समाज की वास्तविकता उद्घाटित न हो । एक सच्चे कलाकार का काम वास्तविक का उद्घाटन करना होता है ,जिससे वह वास्तविक सौंदर्य तक पहुँच सके। इस कविता से ही समझ में आ जाना चाहिए कि जीवन का यथार्थ कविता कैसे बनता है?यहाँ यथार्थ का अंतर्विरोध भी है तो वह यथार्थ भी मौजूद है ,जिसे पोस्टर में नहीं दिखलाया गया है। कवि अपने पाठक को उसी वास्तविक से परिचित कराना चाहता है। यहाँ ’ तुमने भारत को पोस्टरों में देखा है’ पंक्ति की प्रष्नवाचक पुनरावृत्ति बहुत अर्थवान है। लेकिन यह समझ में तब आता है ,जब कवि के पास लोक का अनुभव भी हो ।

 कपिलेश  भोज- एक श्रेष्ठ कविता पाठक को क्या देती है ? यानि पाठक के जीवन में उसकी क्या और कैसी  भूमिका होती है या हो सकती है?
 डाॅ0 जीवन सिंह- श्रेष्ठ कविता पाठक की मानसिकता को परिष्कृत करने का काम करती है। एक व्यक्ति ,मनुष्य के षरीर में इस पृथ्वी पर आता है , किन्तु वह मनुष्यता का वरण अपने प्रयासों से करता है। मनुष्य षरीर में होने मात्र से ,हम मनुष्यता के संवाहक नहीं बन जाते। मनुष्यता का अर्जन करना पड़ता है और उसे निरंतर विकसित करते रहना पड़ता है। लेकिन यथार्थ यह है कि मनुष्यता-अर्जन के लिए व्यक्ति सबसे कम प्रयत्न करता है। एक तरह की ’ धार्मिक मनुष्यता ’ को वह अपने परिवेष ,वातावरण और परिवार से प्राप्त करता है ,जो उसे  ’ मध्यकालीनता ’ की मानसिकता में जकड़े रहती है। वह आधुनिक एवं समकालीन नहीं हो पाता । धार्मिकता की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि उसमें विकास की गुंजाइष बहुत कम होती है। वह व्यक्ति को हमेषा पीछे की ओर धक्का देती है। इसलिए ’ धार्मिक मनुष्ता ’ से जितने खूनी संघर्ष हुए , उतने षायद ही किसी अन्य परिघटना से हुए हों । धर्म की भूमिका के साथ साहित्य की भूमिका भी रहती है। दुनिया का पूर्व आधुनिक साहित्य धर्म की प्रेरणा से भी सृजित हुआ है। वहाँ धार्मिक भावनाएँ और कविता का मिश्रण मौजूद है। तुलसी कृत ’ रामचरित मानस ’ का आज हिंदू घरों में एक धार्मिक कृति की तरह पाठ और पारायण किया जाता है। यहाँ कविता से ज्यादा उसकी पौराणिक-धार्मिकता की भूमिका है। वह हमारी चली आती हुई अर्द्ध सामंती पारिवारिकता को सहलाती है। लोग ’रामचरित मानस ’ की चैपाइयों के प्रमाण से अपने जीवन की पेचीदगियों को सुलझाते हैं। इसी तरह कबीर ,सूर ,मीरा ,रैदास ,नानक ,दादू ,संुदरदास की कविता की धार्मिक-आध्यात्मिक भूमिका मौजूद है। इस तरह की भूमिका आधुनिक साहित्य की अभी तक नहीं बन पाई है। यद्यपि उक्त भूमिका में धार्मिकता का मिश्रण बहुत ज्यादा है , कविता का कम ,तथापि कविता यहाँ माध्यम बनी है। रामकथा पर अनेक ग्रंथ हमारे यहाँ मौजूद हैं किंतु इनमें ’ रामचरितमानस ’ की भूमिका इसलिए सर्वोपरि है कि उसमें कविता की जो सरसता ,सहजता और लोकतत्व की व्यापकता की ताकत है , वह उसे लोकहृदय का हार बना देती है। षायद ही किसी अन्य काव्य ग्रंथ में कविता की ऐसी ताकत हो कि एक काव्यग्रंथ इस तरह का जनकाव्य बन जाय। कविता की चकित कर देने वाली कला तुलसी के यहाँ है। उनकी इसी ताकत , क्षमता और सामथ्र्य ने आधुनिक काल में होने पर भी निराला और त्रिलोचन तक को प्रभावित किया है। लेकिन हमारे समय का काम तुलसी की कविता से नहीं चलता । तुलसी के बाद जमाना बहुत आगे आ गया है। वह न केवल बदला है वरन् गुुणात्मक रूप में उसमें बुनियादी परिवर्तन हुए हैं। वह जमाना था , जबकि भाववादी दर्षन प्रणालियों का वर्चस्व था , आज उन प्रणालियों का वर्चस्व ध्वस्त हो गया है और उनके स्थान पर यथार्थवादी दर्षन  प्रणालियाँ आ गई हैं। विज्ञान और तकनीक ने दुनिया को भीतर से हिला दिया है। पुराने धर्मों और धार्मिक अवधारणाओं के समक्ष प्रष्नचिह्न लग चुके हैं। यहाँ तक कि उन्नीसवीं सदी में ही ईष्वर के अस्तित्व तक को नकार दिया गया था । यथार्थवादी दार्षनिक प्रणालियों के आ जाने से 1789 ई0 में फ्रांस में बुर्जुआ क्रांति हुई । जिसमें ’ देवरूप ’ राजा को पहली बार क्रांतिकारी ढंग से पदच्युत किया गया। इसके बाद उन्नीसवीं सदी में 1917 ई0समाजवादी क्रांति रूस में हुई और इसके बाद 1949ई0 में चीन में। इससे दुनिया में राजसत्ताओं का रूप परिवर्तन हुआ। लोकसत्ताओं के लिए तरह-तरह की कार्यवाहियाँ हुई। इसी वातावरण में हमारे देष को सन् 1947ई0 में ब्रिटिष औपनिवेषक षासन से मुक्ति मिली। इस वातावरण ने कवि की मानस को प्रभावित किया ,जिसकी वजह से साहित्य, मनुष्य केंद्रित हुआ। इससे साहित्य में देवतावाद और सामंतवाद की जगह मानवतावाद की प्रतिष्ठा हुई । साहित्यकार का सौंदर्यबोध बदला , वह ऊपर से नीचे की ओर आया। उसकी देव-निर्भरता खत्म हुई और वह सामंतों-नवाबों ,अमीरों-रईसों की चारित्रक सच्चाइयों को समझ गया। इन सभी बातों में कविता की भूमिका रही है। कवि का ध्यान स्त्री और दलित की ओर खासतौर से गया । इससे पाठकों के सौंदर्यबोध में भी परिवर्तन हुआ।
    श्रेष्ठ कविता अपने रंजक धर्म से पाठक के हृदय में प्रवेष करती है और उसे अपना दोस्त बना लेती है। हृदय के रास्ते वह मन-मस्तिष्क तक पहुँती है। यह अलग बात है कि आज के ज्यादातर कवियों ने हृदय की बात से ही किनारा कर लिया है। ’ कहियै मेरौ हियौ , तेरे हिय की बात ’ - यह कविता की भूमिका है। इसलिए तुलसी ने कविता के लिए ’ हृदय-सिंधु ’ की बात कही है। आज हृदय सिंधु की बात तो कोसों दूर ’ हृदय-सरिता’ और ’ हृदय-कूप ’ भी कहीं-कहीं नजर आते हैं। सबको जल्दी पड़ी हुई है। धीरज गायब है , सच्चाई गायब है ,ईमानदारी गयाब है तो ’ हृदय-सिंधु ’ कैसे बनेगा ? कविता इतनी गद्यात्मक एवं छंदविहीन हो रही है कि वह कविता-कामनी से ज्यादा कविता-राक्षसी लगती है। कविता-राक्षसी से यदि पाठक को डर लगे तो अस्वाभाविक नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि इसमें पाठक की अपनी कोई भूमिका नहीं होती । चूँकि कविता एक तरह का विषिष्ट काव्यानुषासन है इसलिए वह अने पाठक से भी उसी तरह के काव्यानुषासन की प्रक्रिया में आने की माँग करती है। जिस काव्यस्तर और काव्यरूप की हम यहाँ बात कर रहे हैं ,वह कविता का सर्वोच्च रूप है। इस तरह की कविता का भी कोई एक स्तर नहीं होता । वह ’ जनधर्मी ’ होकर ज्यादा संप्रेषित होती है किंतु जब ’ सृजनधर्मी’ होती है तो उसकी आंतरिक सूक्ष्मताओं की वजह से संप्रेषण में बाधा आती है। छंद और मुक्तछंद की कविताओं में भी फर्क होता है। छंद में एक तरह का बंधन रहता है जो कवि की भावानुभूतियों को एक सीमा से आगे नहीं जाने देता है , जिससे हमेषा बात की अपूर्णता का खतरा बना रहता है और कार्य -कारण की श्रृंखला का भी वहाँ निर्वहन नहीं हो पाता । इसी वजह से कविता ने मुक्त छंद का नया रास्ता चुना । मुक्त छंद में भी छंद होता है , किंतु वह किसी षास्त्रीय अनुषासन में बँधा नहीं होता है। मुक्तछंद में छांदिकता को बनाए रखना एक कठिन कर्म है , जिसे कवि बहुत गम्भीरता से नहीं लेते । इसी से वह मुक्तछंद की राह छोड़ कर छंदषून्य गद्यात्मकता की निष्प्राण राह पर चल पड़ी है। छंद कविता का षरीर है , वही रूग्ण होगा तो उसमें प्राणतत्व की ताकत कैसे आ सकेगी ?

Wednesday, 19 October 2011

साधारणता ,सच्चाई ,सक्रियता ,सहजता आदि का नाम ही तो लोकजीवन है -जीवन सिंह

डाॅ जीवन सिंह जी के  साक्षात्कार की पहली कड़ी पर युवा कवयित्री   लीना  मल्होत्रा का कहना है कि   जिस प्रकार से कविता को परिभाषित किया गया है .... श्रेष्ठ और महान कविता में अंतर स्पष्ट किया है वह सिर्फ पढ़ने योग्य नही बल्कि गुनने योग्य है ,यह टिप्पणी  बताती है कि साक्षात्कार में बहुत कुछ  ऐसा है जो कवि और कविता कर्म के बारे में हमारी समझ को बढ़ाता है , प्रस्तुत है इसकी दूसरी कड़ी-





महेश चंद्र पुनेठा - अपने समय के  समाज और संघर्षषील यथार्थ की कलात्मक अभिव्यक्ति करने वाली  कविता एक अच्छी कविता मानी जाती है , पर क्या कलात्मक अभिव्यक्ति का मतलब ऐसी कविता लिखना है जो आसानी से समझ में न आए ,जैसा कि आजकल कलात्मकता के नाम देखने में आ रहा है?
डाॅ0 जीवन सिंह- दरअसल कविता रचने से पहले और रचते हुए कवि को पहले उस पहेली को सुलझाना पड़ता है  जो प्रत्यक्ष जीवन-व्यवहार में आसानी से समझ में नहीं आती। कवि भी अपने वर्गीय संस्कारों ,इच्छा-आकांक्षाओं ,अभिरूचियों तथा स्वार्थों से वैसे ही घिरा बँधा रहता है , जैसे संसार के अन्य व्यवहारी लोग। एक बड़ा और बेहतरीन रचनाकार वह तभी हो सकता है जबकि वह जीवन और समय के सबसे सामान्य धरातल पर उतर उसे यथार्थवादी नजर से समझे और उद्घाटित करने का प्रयास करे। इस मामले में रचना की विचित्र एवं विपरीत गति होती है। वह दुनिया के चलन के अनुसार नहीं चलती । कहा जाता है कि षायर ,सिंह और सपूत लीक छोड़कर चलते हैं और सच्चे एवं बड़े षायर के बारे में बिल्कुल सही बात होती है। जैसे सपूतों के बारे मंे सही है। भगत सिंह सरीखे महान बलिदानी सपूत अपने समय में लकीर छोड़कर चले। कबीर ,निराला ,मीरा ,प्रेमचंद और मुक्तिबोध लीक से हटकर चलने वाले रचनाकार थे। ऐसे रचनाकार कलाकार भी होते हैं ,जिनमंे कला प्रतिभा होती है , लेकिन वे जीवन की पहेली को सुलझा पाने में या तो कामयाब नहीं होते या अपने वर्गीय हितों की वजह से उसे सुलझाना ही नहीं चाहते । इस कोटि के कलाकारों का ज्यादा बल अपनी कलात्मकता की अभिव्यक्ति पर रहता हैै। आधुनिक समय में अज्ञेय ऐसे ही कलाकार कवियों की श्रेणी में आते हैं। जहाँ तक कविता के आसानी से समझ में आने वाली बात है , यह षर्त लगाना ठीक नहीं है। कविता के पाठक को भी कुछ प्रयत्न तो करना ही पड़ता है । जो कविता अपने समय के रिष्तों की पेचीदगियों को समझने में उलझी हुई है , उस कविता से आसानी से समझ आने की माँग करना किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता। कविता का भी अपना काव्यषास्त्रीय अनुषासन होता है , उसे समझे-जाने बिना कविता का आसानी से समझ में आना संभव नहीं है। हाँ , उसे कलात्मक प्रदर्षन के लिए जानबूझकर दुरूह और दुर्बोध बनाना कहीं से भी संगत नहीं माना जा सकता । आजकल जो कविताएँ लिखी जा रही हैं ,उनमें सभी तरह के उदाहरण मिल जाएंगे।



महेश चंद्र पुनेठा - आप लोकजीवन के रचनाकार के लिए प्रकृति से गहरे तक परिचित होना रचना की अनिवार्य षर्त मानते हैं। ऐसा क्यों ?
 डाॅ0 जीवन सिंह- लोकजीवन और प्रकृति में सबसे निकट का और गहरा रिष्ता रहा है। वह लोकजीवन ही क्या ,जो प्रकृति से दूर हो । महानगरीय सभ्यताओं की सबसे बड़ी सीमा ही यह होती है कि ज्यों-ज्यों वे विकसित होती जाती हैं त्यों-त्यों प्रकृति से भी दूर होती जाती हैं। प्रकृति का मतलब है जो सहज एवं स्वाभाविक और जो कृत्रिमता से कोसों दूर है। कृत्रिमता के अपने संकट होते हैं जो जीवन को असामान्य बनाते हैं ,उसे एबनार्मल स्थितियों की ओर धकेलते हैं । इससे समाज में पागलपन बढ़ता है। आज पूरी दुनिया पर्यावरण का संकट महसूस करने लगी है । यह तभी हुआ है जब कि नयी सभ्यता ,प्रकृति से निरंतर दूर होती चली गई । इसका परिणाम यह हुआ है कि आदमी अपनी प्रकृति को छोड़ता जा रहा है। वह उसे भूल रहा है। हमारे देष के लोक जीवन में आज भी प्रकृति की बड़ी भूमिका है। वहाँ आज भी सूर्य-चंद्र के साथ पहाड़ ,नदी , वृक्ष ,जीव-जंतु ,पखेरू आदि के साथ वनों-जंगलों ,खेतों-खलिहानों को कोई मन से दूर नहीं कर पाता। उसे सूर्याेदय और सूर्यास्त देखने के लिए किसी पर्यटन स्थल पर नहीं जाना पड़ता। वह उसके जीवन का हिस्सा है। नदी-पहाड़ उसकी आजीविका के स्रोत हैं। पेड़-पौधों और ढोर-डंगरों से उनका जीवन चलता है। जब यह सब है तो प्रकृति से तो रिष्ता होगा ही। यह सब नहीं होगा तो लोकजीवन और क्या होगा। साधारणता ,सच्चाई ,सक्रियता ,सहजता आदि का नाम ही तो लोकजीवन है ,जहाँ किसी तरह का कोई आडंबर व पाखंड नहीं। 


Sunday, 16 October 2011

श्रेष्ठ कविता पाठक की मानसिकता को परिष्कृत करने का काम करती है- जीवन सिंह


डाॅ0 जीवन सिंह  हमारे समय के एक सशक्त आलोचक हैं। लोकधर्मिता तथा जनपदीयता उनकी आलोचना के केंद्र बिंदु हैं। उनकी आलोचना में हमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा ,शिव कुमार मिश्र आदि लोकधर्मी आलोचकों की परम्परा का विकास दिखाई देता है। उनकी अब तक कविता की लोक प्रकृति , कविता और कवि कर्म तथा शब्द संस्कृति नाम से तीन पुस्तकें आ चुकी हैं।पिछले दिनों 'आकंठ' ने उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर अपना एक अंक केंद्रित किया है।  यहाँ  लोक जीवन  ,कविता , कविकर्म ,आलोचना ,लोक कलाओं आदि विषयों पर समय-समय पर उनसे हुए संवाद की श्रृखंला प्रकाशित की जा रही है । प्रस्तुत है इसकी पहली किस्त -   महेश चंद्र पुनेठा । 




कपिलेश भोज- श्रेष्ठ अथवा अच्छी कविता की पहचान क्या है? यानी वे कौन से मूलभूत कारक हैं जो कविता को श्रेष्ठ बनाते हैं?
डाॅ0 जीवन सिंह- इसका मतलब है कि आप फिर से ’ कविता क्या है?’ जैसा सवाल उठा रहे हैं। सच तो यह है यह सवाल कविता के हर पाठक ,आलोचक और सहृदय संवेदक के मन में उसी समय उठता है जब वह कविता पढ़ने में मन लगाता है। कवि भी जब काव्य रचना में प्रवृत्त होता है तो यह प्रष्न उठे बिना नहीं रहता । जिनके मन में यह प्रष्न नहीं उठता ,वह नकली कवि होता है। एक समय में , ऐसे नकली कवियों की तादाद कम नहीं होती। छंदविहीन लोकतांत्रिक समय में तो तरह-तरह के कवियों की बाढ़ आ जाती है और कवि -सम्मेलनी कवियों को देखकर तो लगता है कि कविता ,उद्योग हो गई है। कविता के ठेके छूटने लगते हैं। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले सभी कवि असली नहीं होते । छंदविहीन(मुक्त छंद नहीं) कविता ने तो यह रास्ता और आसान कर दिया है। छंदबद्ध कविता में तुक मिलाने ,मात्राएं गिनने और प्राष जोड़ने में कुछ तो जोर आता था ,अब तो वह अनुषासन भी नहीं रहा। जब कविता को रस,अलंकार ,ध्वनि , वक्रोक्ति ,रीति के पैमाने से नापा जाता था , जब कवि को कुछ तो ध्यान ,अभ्यास , मनन ,चिंतन ,भाषा पर अधिकार का ध्यान रखना पड़ता था । कविता को नौ स्थायी भावों की चैहद्दी में रखते हुए जीवन से उसका रिष्ता जोड़ना पड़ता था । तुलसी ने कहा है ’ कविहि अरथ आखर बल साचा।’ आज तो हालात ये हैं कि न तो अर्थ का बल है न षब्द का । आज के ज्यादातर कवि न तो षब्द-प्रयोग के प्रति सजग हैं , न अर्थ -षोध के प्रति।
  फिर भी अच्छी कविता हम किसे कहें ,यह सवाल बार-बार उठता रहता है। हर युग में यह सवाल उठा है। आचार्य रामचंद्र षुक्ल ने इसी सवाल के उत्तर में अपनी सारी आलोचना लिखी है। ’कविता क्या है?’ षीर्षक से भी उन्होंने एक लंबा निबंध लिखा है , जिसके प्रारूपों को वे निरंतर विकसित करते एवं बदलते रहे हैं। उसमें अच्छी कविता के पहचान का एक अच्छा जबाव मौजूद है। लेकिन दुनिया और समय आचार्य रामचंद्र षुक्ल के समय से बहुत आगे आ चुके हैं और बहुत बदल चुके हैं। आचार्य षुक्ल ने अच्छी कविता की पहचान के लिए जो कसौैटी बनायी थी , उसका आधार मध्यकालीन भक्तिकाव्य और खासतौर से तुलसी की काव्यकला थी। तुलसी की कविता से ही उनके ’लोकहृदय’ ’लोकमंगल’ और ’ लोकधर्म’ जैसे कुछ प्रतिमान निकलकर आए थे , किंतु उनके बाद से कविता की संरचना ,ढँाचा व स्वरूप ही बदल गया है। षुक्ल जी  ने कहा था कि कविता मनुष्य भाव की रक्षा करती है। यह आज भी अच्छी कविता की पहचान का एक आधार बिंदु हो सकता है। पहले कविता के साथ केवल ’भाव’ की बात की जाती थी। भाव का मतलब होता था- स्थायी भाव ,विभाव,अनुभाव और संचारी भाव। रीतिकालीन कविता का सारा ढाँचा इसी प्रक्रिया से बना है या फिर वे कविता में अलंकरण की प्रवृत्ति को केंद्र में रखते थे। इससे ’ भाव ’ की पूर्ति तो हो जाती थी ,मनुष्य भाव की पूरी तरह नहीं। रीतिकालीन कविता का भाव भी यद्यपि ’मनुष्यभाव’ ही होता था ,किंतु उसके जीवनसंदर्भ इतने सीमित और अभिजातधर्मी होते थे कि वह सिकुड़-सिमट कर रह जाता था। आज की कविता के केंद्र में भी मनुष्यभाव ही है , किंतु वह पुरानी काव्यपरम्परा की तुलना में बहुत विस्तृत एवं व्यापक हुआ है। सच तो यह है कि उसने उन पुरानी भाव-प्राचीरों को ढहा दिया है जो एक खास तरह के मनुष्य के भावों को लेकर चलती थी। कहना न होगा कि छायावादी कविता तक ,यद्यपि भाव अपनी परिधियों को बहुत तेजी से तोड़ रहा था ,तथापि वह रह-रहकर अपनी पुरातनता की ओर  जाता था । प्रसाद कृत ’कामायनी’ भाव का अभिजात्य पूरी तरह टूट नहीं पाया था। मनु की पुरानी सभ्यता का पतन हो गया था , किंतु उसका अभिजात्य गौरव उसके मन में बसा हुआ था ,यद्यपि प्रसाद जी ने अपने समय के अनुरूप बहुत-सी सीमाओं को ढहाकर उसको युगानुरूप बनाने की कोषिषें की थी। महादेवी का स्त्रीभाव अपने तरीके से भावविस्तार करने की भूमिका में था। पंत ने प्रकृति और नारी सौंदर्य को केंद्र में रखकर मनुष्यभाव को नया आयाम प्रदान किया था। सच में तो अकेले निराला थे जो भाव की अभिजात्य प्रकृति और संस्कारों से जूझने का बल लेकर आए थे। इसलिए मनुष्य-भाव का जैसा विस्तार और व्यापकता उनके रचना-संसार मंे आ पाए ,वैसा दूसरे कवियों में नहीं । अगली कविता के दिषा-प्रवर्तक वे ही बन पाए। प्रगतिवादी और नयी कविता के आरंभिक सूत्र उनके यहीं से निकलते दिखाई देते हैं। गद्य में जो काम प्रेमचंद ने किया ,कविता में वैसा ही काम निराला ने किया । इसलिए अच्छी कविता के सूत्र हमको वहाॅ मिल सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि प्रसाद , पंत ,महादेवी के यहाँ अच्छी कविता नहीं हैं। दरअसल यह ’अच्छी’ और ’श्रेष्ठ’ षब्द का गड़बड़घोटाला हो सकता है। हम जानते हैं कि इसी ’श्रेष्ठ’  से हमारी भाषा का ’सेठ’ षब्द निकला है। और ’सेठ’ कितना ’अच्छा ’ होता है ,यह भी अब हम अच्छी तरह जानते हैं। एक जमाना था जब राजा-महाराजा , सेठ-साहूकार , रईस , नवाब आदि षब्दों को उनकी अभिजात्य स्थिति से आँका जाता था ,किंतु जबसे इनके षोषक-उत्पीड़क स्वरूप का उद्घाटन हुआ ,तब से इन षब्दों में भी अर्थापकर्ष हो गया है। मुझे यहाँ श्रेष्ठ षब्द में कुछ-कुछ वही ध्वनि सुनाई पड़ती है। कहने का तात्पर्य यह है कि या तो हम ’श्रेष्ठ’ की भी श्रेणियाँ बनाएं।जैसे अंग्रेजी में गुड ,बैटर और बैस्ट । तब तो अच्छी कविता को सही तरह से नापा जा सकेगा। निराला यदि ’बैस्ट’ यानी ’सर्वोत्तम’ की श्रेणी में होंगे तो दूसरे भी बीच में तो रहेंगे। इसी तरह मुक्तिबोध और अज्ञेय की कविता की बात ,जहाँ एक वर्ग अज्ञेय को श्रेष्ठ मानता है तो दूसरा मुक्तिबोध को। यहाँ भी गुड ,बैटर ,बैस्ट होगा तो समस्या का समाधान हो जाएगा। अज्ञेय यदि गुड की श्रेणी में आएंगे तो मुक्तिबोध उनसे बैटर तो होंगे ही। कदाचित् इसीलिए अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि-चिंतक टी0एस0इलियट ने कविता को ’गुड’ और ’ग्रेट’ पोइट्री में रखकर देखा। जहाँ तक ’गुड पोइट्री’ (अच्छी कविता) का सवाल है ,एक युग में बहुत से कवि ’ अच्छी कविता’ लिखते हैं  लेकिन ’ गे्रट पोइट्री ’ ( महान कविता ) लिखना बहुत मुष्किल होता है। वह उतनी ही बड़ी निष्काम साधना , तपस्या , त्याग और उदात्त जीवनमूल्यों का भोक्ता ही कर सकता है।  राजसी भाव से जीवन-व्यतीत करने वाले लोग भी श्रेष्ठ कलाकर्म और चिंतन का काम कर जाते हैं किंतु महानता के लिए सत्व गुण का सिद्धांत और व्यवहार दोनों स्तरों पर विकास करना पड़ता है। आजादी के पहले लिखी गई कविता में यह काम ’निराला’ ने किया , आजादी के बाद मुक्तिबोध ने । आजादी के बाद का ही ज्यादातर लेखन अज्ञेय का है। वह श्रेष्ठ लेखन की श्रेणी में तो अवष्य आता है लेकिन महान लेखन की श्रेणी में नहीं । इसकी वजह यह है  िकवे अपने समय के तीखे और बुनियादी सवालों को नहीं उठाते हैं। अकेले ’व्यक्ति स्वतंत्रता’ के सवाल को उठाते हैं। व्यक्ति की अद्वितीयता को कंेद्र में रखते हैं।यह भी यद्यपि जरूरी है लेकिन मुक्तिबोध व्यक्ति स्वतंत्रता के साथ समता और बंधुत्व के सवालों को भी उठाते हैं। वे बुनियादी तजुर्बों की तह तक जाते हैं ,अज्ञेय ऐसा नहीं कर पाते। दूसरे , मुक्तिबोध ने अपने व्यक्तित्व का निरंतर विस्तार किया ,जबकि अज्ञेय ने स्वयं को एक निष्चित परिधि से बाहर नहीं निकलने दिया। मैं समझता हूँ कि इससे आपकी बात साफ हो गई होगी। फर्क अच्छी कविता और महान कविता का है।

कपिलेश भोज- आपने श्रेष्ठ कविता के जिन गुणों की चर्चा की ,उनके परिप्रेक्ष्य में कुछ चुनिंदा कविताओं का  उल्लेख करते हुए उनका विष्लेषण भी कर दें तो इस बात को व्यावहारिक धरातल पर साफ-साफ समझ पाने में और आसानी होगी ।
 डाॅ0 जीवन सिंह- वस्तुतः पहले प्रष्न के उत्तर में जो बातें कही गई हैं वे अभी पूर्ण नहीं हुई हैं। उसमें अच्छी और  बड़ी कविताओं की बुनियादी बात ही आ पाई है। ’ अच्छी कविता’ में केवल कलात्मकता का सौंदर्य ही उसे अच्छी कविता का दर्जा दिला सकता है। कवि की बिंब योजना अर्थात बिंबों की ताजगी मात्र ही उसे अच्छे कवि की श्रेणी में रख सकती है। हमारे यहाँ श्रेष्ठ कविता का सबसे बड़ा प्रमाण षमषेर की कविता को कहा जा सकता है। प्रगतिवादी दौर की कविता में जिस तरह की प्रचारात्मकता परवान चढ़ गई थी , उस माहौल को षमषेर जैसा प्रगतिषील कवि अपने सौंदर्य नियोजन से बदलता है। उन्होंने हिंदी-कविता को नई भाषा ही नहीं वरन् नई संरचना से भी समृद्ध किया। वाक्यों की जगह ’षब्द’ संरचना को भी केंद्र में रखा । वे सीधी-सपाट रचना के कवि न होकर वर्तुल-संरचना के कवि ज्यादा हैं। बिंबों के अद्भुत स्रष्टा वे रहे हैं ,जिनमें कल्पना का वेग विषिष्टता के स्तर पर न होकर , सामान्यता के स्तर पर होता है। उनकी भाषा में लाक्षणिकता का विलक्षण गुण रहता है किंतु वह छायावादी भाषा की तरह वायवीय नहीं होती । वहाँ होता है सब कुछ सामान्य ,लेकिन प्रयोग में वह अनन्य व्यंजनाधर्मी हो जाता है। श्रेष्ठ कविता के लिए ये बातें जरूरी होती हैं। षमषेर की कविता से एक उदाहरण:
        फिर भी क्यों मुझको तुम / अपने बादलों में घेर लेती हो / मैं निगाह बन गया स्वयं/जिसमें तुम आँज गई/अपना सुरमई साँवलापन / तुम छोटा-सा ताल /घिरा फैलाव ,लहर हल्की-सी / जिसके सीने पर ठहर षाम / कुछ अपना देख रही उसके अंदर ।
   प्रेम की काव्यात्मक अभिव्यक्ति का यह विरल और अनूठा उदाहरण है। प्रेम-स्मृति का अद्भुत संयोजन यहाँ किया गया है,जहाँ कल्पना की निराधार उड़ान नहीं । इसलिए मैंने कहा कि इस तरह की श्रेष्ठ कविताओं के अनेक उदाहरण षमषेर के यहाँ मिल जाएंगे । लेकिन यहाँ व्यक्ति जीवन का अंतरंग ज्यादा आता है । वह बहिरंग बचा रहता है ,जो हमारे बाहर और भीतर दोनों ही जगहों पर संगर बचाए रहता है। कोषिष षमषेर ने बहिरंग को लाने की भी की ,किंतु अंतरंग की तरह बहिरंग उनसे ज्यादा नहीं सध पाया। अंतरंग और बहिरंग का संतुलन यदि किसी एक कवि में है तो वह हैं मुक्तिबोध । वे अपनी सीमाओं के बावजूद बड़ कवि हैं , क्योंकि जीवन की व्यापकता और विस्तार को बुनियादी तौर पर साधने की कला उनको आती है जो उन्होंने अपने जीवन का सर्वस्व बलिदान करके उन्होंने हासिल की थी। इसलिए वे श्रेष्ठ कवि तो हैं ही हमारे समय के बड़े कवि भी हैं। नागार्जुन ,केदार ,त्रिलोचन भी श्रेष्ठ कवि हैं और अपने तरीके से महत् की परिधियों तक जाने का प्रयास करते हैं। इनमें भी नागार्जुन अपने महत् का जितना विस्तार कर पाते हैं उतना त्रिलोचन , केदार नहीं। दरअसल इन सभी में जो विकलता और बेचैनी मुक्तिबोध के यहाँ है ,यानी आत्मिक और अनात्मिक दोनों स्तरों पर जिस तरह का मजमून वे बाँधते हैं ,वैसा दूसरों से सध नहीं पाता। इनमें जीव-व्याप्ति होने के बावजूद एक तरह की आंतरिक या आत्मिक व्याप्ति की कसर रह जाती है।
  केदार ,नागार्जुन ,त्रिलोचन की परम्परा को अपनी-अपनी दिषा में विकसित करने वाले दो कवियों का नामोल्लेख करना यहाँ प्रासंगिक होगा। एक केदारनाथ सिंह ,दूसरे विजेंद्र । दोनों ही त्रिलोचन को अपना कव्य गुरू मानते हैं।केदारनाथ सिंह का हिंदी जनपद भोजपुर है ,जबकि विजेंद्र का ब्रज । इनकी कविताएं श्रेष्ठ कविता की श्रेणी में आती हैं । इनसे श्रेष्ठ कविता के प्रतिमान खोजे जा सकते हैं ,लेकिन इनमें भी महत् का जो विस्तार विजेंद्र के यहाॅ देखने को मिलता है ,वह केदारनाथ सिंह के यहाँ नहीं। इसका कारण है कि विजेंद्र अपनी जमीन को नहीं छोड़ते जबकि केदारनाथ सिंह पष्चिम की हवाओं के फेर में ज्यादा रहते हैं। दूसरे , केदारनाथ सिंह अपने व्यक्ति की परिधि में रहते हैं उसका अतिक्रमण करके सामाजिकता के तीखे प्रष्नों के रू-ब-रू नहीं हो पाते। उनकी तुलना में विजेंद्र दो कदम आगे दिखाई देते हैं। तीसरे , केदारनाथ सिंह कविता में वक्रता का चमत्कार पैदा करते हैं ,जबकि विजेंद्र सहजता के किसानी स्तर को नहीं छोड़ते । विजेंद्र की कविता में देष ,काल ,जीवन संसार और प्रकृति तक जितना विस्तार है , उतना केदारनाथ सिंह की कविता में नहीं।केदार जी अपनी बात को कलात्मक बनाने के फेर में अपने समय के यथार्थ को छोड़ते चलते हैं। इनसे पूर्व रघुवीर सहाय , सर्वेष्वर ,श्रीकांत वर्मा ,धूमिल ,कुँवरनारायण आदि की कविताओं की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर होती रही है लेकिन इनके यहाँ भी श्रेष्ठ कविता के प्रमाण तो हैं ,महत् को व्यक्त करने वाली बड़ी कविता इनके यहाँ भी नहीं है। यह बात अलग है कि जब परिदृष्य में बड़ी कविता न हो तो श्रेष्ठ को ही वरेण्य मान लिया जाता है। इसके बावजूद ,उक्त कवियों की काव्य परिधि न केवल सीमित है वरन् जिंदगी के बुनियादी तजुर्बों से भी दूर है। इनमें भी राजनीतिक काव्य कुषलता की वजह से रघुवीर सहाय को काफी महत्व मिला है ,लेकिन उनकी ,यथार्थ एवं जीवन-सौंदर्य को व्यक्त करने की एक सीमा है। वे मध्यवर्गीय चैहद्दियों में तो बड़े दिख सकते हैं लेकिन इससे आगे उनके यहाँ ज्यादा मसाला नहीं मिलता । चूँकि हिंदी का माहौल ऐसा बना दिया गया है कि यहाँ विचारधारा से तात्पर्य ’ राजनीतिक विचारधारा ’ से ही लिया जाता रहा है। इस वजह से भी रघुवीर सहाय की लोहियावादी समाजवादी विचारधारा को अतिरिक्त महत्व मिलता रहा है। मुक्तिबोध के षब्दों में कहूँ तो इनकी प्रतिमाएँ अधूरी रही हैं और वेदना के स्रोत संगत एवं पूर्ण निष्कर्षों तक पहुँचे हुए नहीं हैं। आधे-अधूरे की विडंबना का कौषल ही यहँा ज्यादा है-वह ज्योति अनजानी सदा को सो गई/ यह क्यों हुआ!/क्यों यह हुआ !!/ मैं ब्रह्म रासक्ष का सजल-उर षिष्य / होना चाहता /जिससे कि उसका वह अधूरा कार्य /उसकी वेदना का स्रोत / संगत ,पूर्ण निष्कर्षों तलक /पहुँचा सकूँ।
   मुक्तिबोध की खूबी और महत्व इसी बात में है कि वे अधूरे को समग्रता की ओर ले जाते हैं । वे वेदना के स्रोत संगत तरीके से पूर्ण निष्कर्षों तक पहुँचाने का सफल प्रयास करते हैं। उनके यहाँ इसी से एक क्लैसिक ऊँचाई आ गई है । निराला के बाद कदाचित ऐसा मुक्तिबोध के यहाँ संभव हो पाया है। इन कवियों के यहाँ एक खास बात यह है कि इनके स्वयं के जीवन के हषर््ा-विषाद बहुत ईमानदारी और सच्चाई के संग इनकी काव्य-रचना का हिस्सा बनते हैं। इनकी कविता में एक कवि के जीवन का उदात्त बोध हुए बिना नहीं रहता । अन्य कवियों के यहाँ जीवन का विस्तार तो मिलता है ,किंतु स्वयं के जीवन से प्रमाणित वह उच्चताबोध बहुत कम देखने में आती है , जो निराला और मुक्तिबोध में । इनके यहाँ जीवन और कविता का फर्क ही जैसे मिट जाता है। जो जीवन है इनका , वही इनकी कविता है और जो इनकी कविता है वही जीवन है। भावपूर्णता की दृष्टि से देखें तो मुक्तिबोध के यहाँ अद्भुत ,करूण ,रौद्र ,भयानक और वीभत्स का जैसा फैलाव मिलता है ,जिसे दूसरे कवि अपने जीवनानुभवांे में नहीं ला पाते , वैसा कदाचित संपूर्ण आधुनिक कविता में कहीं हो । तुलसी और निराला के बाद जीवन की इतनी आवेगमयी अंतव्र्याप्ति मुक्तिबोध की कविताओं में ही नजर आती है। बड़ी कविता , दरअसल वही होगी जो जीवन के उन दर्रों , कंदराओं , बियाबानों ,बीहड़ों ,निर्जनों और घाटियों तक में प्रविष्ट होने का हौसला रखती है, जहाँ सामान्यतया लोग जाने तक की हिम्मत नहीं जुटा पाते । मुक्तिबोध के इंद्रियबोध की विलक्षणता का एक प्रमाण मैं उनकी प्रसिद्ध एवं चर्चित कविता ’चंबल की घाटी’ से दे रहा हँू - अरे ,यह चंबल घाटी है ,जिसमें /पहाड़ों के बियाबान / अजीब उठान और धसान-निचाइयाँ/ पठार व दर्रे/ छोटी-छोटी दूनें / कंटीले कगार और सूखे हुए झरनों की / बहुत-बहुत तंग / और गहरी हैं पथरीली गलियाँ/ गोल-मोल टीले व खंडहर-गढ़ियाॅ ---/ बंदूकें ,कारतूस ,छर्रे!! / कोई मुझको कहता है ---/ ’ षांत रहो ,धीर धरो ,/और ,उल्टे पैर ही निकल जाओ यहाँ से / जमाना खराब है / हवा बदमस्त है / बात साफ-साफ है / सब यहाँ त्रस्त हैं / दर्रों में भयानक चेहरों की गष्त है’। कहना न होगा कि ’भयानक’ और ’भय’ का यह चित्र आज के पहाड़ी जीवन के अनुभव वाले कवियों में भी , इस तरह का षायद कहीं मिले। पहाड़ और पहाड़ी घाटियों ,दर्रों ,उनके उठानों -निचाइयों -धसानों ,पठारों आदि को बहुतों ने देखा है किंतु मुक्तिबोध के यहाँ ये बातेें जिस तरह से आई हैं और इनसे ’ भयानक ’ का भयभीत करने वाला जो चेहरा हमारे सामने आता है ,वह अपने आप में अनूठा तो है ही ,विरल भी है। ’भय’ पर न जाने आज के कितने कवियों ने कविताएं लिखी हैं किंतु अपने परिवेष के साथ यहाँ जो बात आई है ,वह यहीं की बात है । इस बंध में कुल अठारह छोटी-बड़ी लय के प्रवाह में पिरोई हुई पंक्तियाँ हैं। इनमें प्रथम नौ में पहाड़ी संरचना की भयभीत कर देने वाली विकटता का चित्र है। ’ बियाबान’ षब्द मुक्तिबोध का अति प्रिय और उनकी कविता का बीज षब्द है ,जो सामान्यतया सघन जंगल और बीहड़ों के लिए प्रयुक्त होता है। चूँकि पहाड़ों में भी जंगल होते हैं और स्वयं पहाड़ भी बियाबानों की तरह ही होते हैं। इसलिए यहाँ ’ पहाड़ों के बियाबान’ अपनी बिंबात्मक सटीकता का अद्भुत प्रभाव पाठक के मन पर छोड़ता है। यहाँ एक तरह से प्रकृति का निरीक्षणात्मक चित्रण है। इससे आगे की नौ पंक्तियों में उक्त सृजनात्क भयानकता का जब पाठक के मन पर एक प्रभाव अंकित हो जाता है तो मानवीय भयानकता सामने आती है। पहाड़ी भयानकता से ज्यादा मारक है मनुष्यकृत भयानकता । इसी से असली बात निकलकर आती है- जमाना खराब है/ हवा बदमस्त है / बात साफ-साफ है/ सब यहाँ त्रस्त हैं / दर्रों में भयानक चेहरों की गष्त है।
   इनकी व्यंजना पर गौर करें तो ये पंक्तियाँ , जो आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व लिखी गई होंगी तो मालूम होगा कि वे आज हमारे समय के सच का बयान ,ज्यादा सटीकता से कर रही हैं। समझने की बात है कि मुक्तिबोध अपने समय की गहराई में कितना उतर गए हैं कि मनुष्य जीवन का एक बड़ा सत्य निकलकर आया है। कितने कवि हैं आज , जो इस तरह अपने समय की अंधी गहराइयों में प्रविष्ट होने की क्षमता रखते हैं । मैंने कहा कि अच्छी कविता तो सतही अनुभवों और षब्द की कला के मेल से संभव हो सकती है लेकिन बड़ी और महान कविता नहीं । संभव हो सकता है कि अच्छी कविता का अभ्यास करते-करते कोई कवि बड़ी कविता की दिषा में प्रस्थान कर जाए। इसी के लिए एक समर्थ कवि को अपना जीवन दाव पर लगाना पड़ता है। दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते , जीवन भी सधा रहे और कविता भी बड़ी हो जाय। जिन्होंने जीवन साधा है , उनकी कविता कभी बड़ी नहीं हो पाई।